Fast Delivery
Shipping Australia wide
Easy Returns
Hassle-free policy
100% Authentic
Genuine products
Secure Checkout
Safe & encrypted
Product Description
About The Product:
जाति जनगणना का सवाल सिर्फ़ आँकड़ों का सवाल नहीं है। यह सत्ता, संसाधन, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल है। यह किताब इसी सवाल को इतिहास की गहराई, राजनीति की जटिलता और समाज की संरचना के साथ जोड़कर देखती है। डॉ. लक्ष्मण यादव की यह पुस्तक जाति जनगणना को किसी ख़ास दौर तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे मानव सभ्यता की शुरुआती गिनतियों से लेकर आज़ाद भारत की राजनीतिक बहसों तक फैले लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवाह में रखती है। किताब का बड़ा हिस्सा आधुनिक भारत में जाति जनगणना के इर्द-गिर्द खड़े आंदोलनों और विचारधाराओं पर केंद्रित है। फुले-शाहू-आंबेडकर, अय्यंकाली, नारायण गुरु, त्रिवेणी संघ, अर्जक संघ, समाजवादी आंदोलन, पिछड़ा वर्ग आयोगों, मंडल आयोग और मंडल आंदोलन से होते हुए कांशीराम के बहुजन विचार तक। यह किताब दिखाती है कि जाति जनगणना कैसे ‘जात से जमात बनाने’ का बुनियादी ज़रिया है। जाति जनगणना ने बहुजन गोलबंदी, राजनीतिक चेतना और सामाजिक परिवर्तन का औज़ार बनी। शैली के स्तर पर यह किताब आम पाठकों के लिए लिखी गई है, मगर इसके भीतर मौजूद सवाल पूरी तरह अकादमिक हैं। ये किताब उन तमाम सवालों का जवाब देती है, जिनको लेकर या तो भ्रम की स्थितियाँ हैं या अज्ञानता की। इस किताब सबसे बड़ी खासियत है— जटिल सामाजिक और ऐतिहासिक विमर्श को सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादात्मक भाषा में प्रस्तुत करना। जाति जनगणना दरअसल जाति की राजनीति, सामाजिक न्याय के वैचारिक संघर्ष और भारतीय लोकतंत्र की अधूरी परियोजना पर एक गंभीर, मगर पठनीय हस्तक्षेप है।
Product Details:
Legal Disclaimer : Product color may slightly vary due to photographic lighting sources or your monitor settings.










